JAC Board Solutions : Jharkhand Board TextBook Solutions for Class 12th, 11th, 10th, 9th, 8th, 7th, 6th

         भक्ति : बोध और विश्लेषण    

               


                                      भक्ति : बोध और विश्लेषण

संपूर्ण भक्ति-काव्य की आधारिक चेतना है भक्ति-चेतना । यह भक्ति-चेतना ही तत्कालीन काव्य में
साध्य के रूप में प्रतिफलित हुई थी। जाहिर है बिना भवित' शब्द के अंतर्गुहय अर्थ को समझे भक्ति-काव्य
को हम नहीं समझ पायेंगे।
  "भक्ति' शब्द के लिये शब्दकोशों में अनेक पर्यायवाची शब्द दिये गये हैं। वहाँ अनुराग','उपासना',
'आराधना', और 'पूजा' शब्दों से भी भक्ति को अभिहित किया गया है, परंतु अर्थवता की दृष्टि से इन सभी
शब्दों की अर्थ-व्युत्पत्ति में विभेद है। भक्ति' शब्द की व्युत्पति 'जज' धातु से हुई है। इस अर्थ में यह
'भजना' से संबंध रखता है। नारद मुनि ने कहा है कि भक्ति 'परम प्रेमरूपा' और 'अमृत स्वरूपा' है। इसे
प्राप्त कर मनुष्य सिद्ध, अमर और तृप्त हो जाता है। अपने 'भक्ति-सूत्र' में वह कहते हैं-'सा त्वस्मिन् परम
प्रेमरूपा, अमृत स्वरूपा च ।" वह आगे भी कहते हैं-'यलम्वापुमान पुमान सिद्धो भवति अमृतो भवति, तृप्तो
भवति ।"-(भक्ति-सूत्र) । श्रीमद्भागवत में भक्ति की व्याख्या यों की है-"मय्यर्पित मनोबुद्धियोर्मत भक्त:स
भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि और विभिन्न धाराएँ
मे प्रिय:'-अर्थात 'मन और बुद्धि से अपने को ईश्वर को अर्पित कर देना ही भक्ति है। पाराशर के पुत्र व्यास
ने पूजा वगैरह में अनुराग मात्र को भक्ति माना है। ऐसे ही गर्गाचार्य ने कथादि में अनुरक्ति को भक्ति की संज्ञा
से अभिहित किया है। भक्तिसूत्र में कहा गया है—“पूजादिष्वनुराग इति पराशयैः । कथादिष्वित गर्ग:"।
'भक्ति' शब्द की व्याख्या कई तरह से की गयी है। नारद ने यदि 'ईश्वर के प्रति परम प्रेमरूपा और
अमृतस्वरूपा' कहकर भक्ति को व्याख्यायित किया है तो शौडिल्य ने 'ईश्वर के प्रति परम अनुराग रूपा' ('सा
पगनुरक्तिरीश्वरे') कहकर भक्ति' के अर्थ को स्पष्ट किया है। वल्लभाचार्य ने भगवान में माहात्म्यपूर्वक सुदृढ़
और सतत स्नेह को ही भक्ति माना है । वे कहते हैं कि मुक्ति को इससे सरल उपाय और कुछ भी नहीं है―
“माहात्म्यज्ञान पूर्वस्तु, सुदृढ़ः सर्वतोधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिने चान्येथा।"
'भक्ति' शब्द के अंतर्गुह्य अर्थ को स्पष्ट करने हेतु इन सभी आचार्यों एवं महात्माओं के उपर्युक्त सभी
मतों के आलोक में यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि हृदय और बुद्धि-अनुराग और ज्ञान की स्वीकृति प्रायः सभी
आचार्यों ने की है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें ही क्रमशः 'प्रेम और श्रद्धा' शब्दों से रूपायित किया है।
ऐसा लगता है आचार्य शुक्ल ने उपर्युक्त सभी मतों का समाहार प्रस्तुत करते हुए कहा कि “श्रद्धा और प्रेम के
योग का नाम ही भक्ति है।" वे यह भी कहते हैं कि श्रद्धा और प्रेम में से किसी भी एक के अभाव में भक्ति
कथमपि नहीं पनप सकती।
भक्ति एक रस है और उसका स्थायी भाव भी भक्ति ही है। शाण्डिल्य भक्ति-सूत्र' के अनुसार ईश्वर
में परम अनुरक्ति ही भक्ति है—सा परानुरक्ति: ईश्वरे । तभी यह ईश्वर विषयक अनुरक्ति भक्ति-रस का स्थायी
भाव ठहरती है। भरत मुनि ने भक्ति को शांत रस के अंतर्गत परिगणित किया है परंतु शांत रस के स्थायी निर्वेद
से भक्ति का स्पष्ट विरोध है क्योंकि भगवद्विषयक प्रेमरूप है। मम्मटाचार्य ने भी देवादिविषयक रति को केवल
भावरूप में स्वीकार किया है। इस विवेचन से स्पष्ट होता है कि भक्त की भगवान में जो पूज्य भावना होती
है, उसमें श्रद्धा, प्रेम, भीति आदि कई चित्तवृत्तियों का संयोग होता है। अतएव भक्तिभाव का सर्वजन-सुलभत्व
भी प्रामाणिक तथ्य बन जाता है।
भगवान के प्रति व्यक्तिगत प्रिय संबंध प्रेमाभिव्यक्ति का रूप ग्रहण कर लेता है। निर्गुण संतों ने
प्रेमलक्षणा भक्ति को, जो निष्काम होती है, इसीलिये बड़े उत्साह से स्वीकार किया है।
भक्ति भाव है या रस इस संबंध में साहित्याचार्यों में मतभेद बना हुआ है। भरत मुनि रसों में भक्ति
का उल्लेख नहीं करते । देवविषयक रति ही भक्ति है। आचार्यमम्मट ने अपने 'काव्य-प्रकाश' में सर्वप्रथम
देवविषयक रति को स्वतंत्र भाव की संज्ञा प्रदान की। पंडितराज जगन्नाथ ने अपने 'रस-गंगाधर' में भक्ति को
रस न मानने के संबंध में प्रश्न उठराया है। भरत मुनि द्वारा स्थापित इस व्यवस्था को भंग करना कदाचित उन्हें
स्वीकार न था। हिंदी के प्रसिद्ध काव्य-शास्त्रज्ञ कन्हैयालाल पोद्दार ने भक्ति को केवल भाव न मानकर 'रस'
माना है। वल्लभ संप्रदायी ग्रंथ 'हरिभक्ति रसामृत-सिंधु' (श्री रूप गोस्वामी विरचित) में 'भक्ति रस' का
विस्तृत शास्त्रीय विवेचन प्राप्त होता है।
का आदोलन की आधि और विभिन्न भाषाएँ
इस प्रकार आलवार संतों द्वारा नाम संकीर्तन धारा' से दक्षिण को रससिक्त कर भक्ति की मधुर हिलोर
उत्तर भारत की ओर बहायी गयी। यही भावना विकसित होकर अनेक रूपों में साहित्य में भी काव्य रचना में
प्रवाहित हुई। यह छंद यों ही नहीं कहा गया कि―
                           "भगति द्राविड़ ऊपजी लाये रामानंद
                        परगट कियों कबीर ने सात द्वीप नवखंड।

                                                   ★★★
और नया पुराने