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 संत-काव्य : प्रत्यय और परंपरा

             


                          संत-काव्य : प्रत्यय और परंपरा


हिंदी काव्य के भक्तिकालीन साहित्य के इतिहास में एक विशिष्ट काव्य-धारा चली थी । विभिन्न
विचारकों ने इसे विभिन्न नाम दिये हैं। आचार्य शुक्ल ने इसे 'निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा', आचार्य द्विवेदी ने इसे
'निर्गुण भक्ति साहित्य' और डॉ० रामकुमार वर्मा ने इसे 'संत काव्य-परंपरा' नाम से अभिहित किया था ।
'ज्ञानाश्रयी' शब्द में अनेक भ्रांतियों के लिये स्थान है। ऐसा लगता है मानों इस धारा के कवियों ने ज्ञान तत्त्व
को अधिक महत्त्व दिया है, जबकि प्रेम के 'ढाई आखर' के सम्मुख इस धारा के कवियों ने 'पोथी के ज्ञान'
को तुच्छ बताया है। इसीलिये डॉ श्रीकृष्ण लाल इसे 'निर्गुण ज्ञानाश्रयी' के बदले 'निर्गुण ज्ञानाभासाश्रयी' शाखा
नाम से अभिहित करना अधिक संगत मानते हैं। फिर भक्ति का आलम्बन सगुण ईश्वर ही उपयुक्त है। अस्तु,
'निर्गुण भक्ति साहित्य' नाम भी अपने-आपमें असंगत प्रतीत होता है । वस्तुत: इस धारा के कवियों का एक
विशेष दृष्टिकोण है जो 'संत' शब्द द्वारा ही ध्वनित होता है। अस्तु इसे संत-काव्य कहना अधिक श्रेयस्कर
माना गया।
   'संत' शब्द की व्याख्या अनेक रूपों में की गयी है। डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने इस शब्द की
व्युत्पति 'शांत' शब्द से मानी है। परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार 'संत' शब्द उस व्यक्ति की ओर संकेत करता
है जिसने संत रूपी परम तत्व का अनुभव कर लिया हो और इस प्रकार अपने व्यक्तित्व से ऊपर उठकर उसके
साथ तद्रूप हो गया हो । जो 'सत्त' स्वरूप अर्थात नित्यसिद्ध वस्तु का साक्षात कर चुका हो, अथवा अपरोक्ष
की उपलब्धि के फलस्वरूप अखंड सत्य से प्रतिष्ठित हो गया हो, वही 'संत' है। कुछ लोग संत को 'सत्'
से विकृत मानते हैं। डॉ. विनयमोहन शर्मा ने कहा है कि "संत वही है जो आत्मोन्नति सहित परमात्मा के
मिलन-भाव को साध्य मानकर लोकमंगल की कामना करता है।"
        व्यापक रूप में ईश्वरोन्मुख सज्जन पुरुष ही संत कहे जायेंगे। तुलसी को भी संत शब्द का व्यापक अर्थ
ही मान्य है। 'संत समागम हरिभजन, तुलसी दुर्लभ होय' अथवा 'संत हंस गुन गहहि पय, परिहरि वारि बिकारि
कहकर वे यही कहना चाहते हैं। संकुचित अर्थ में निर्गुण उपासक मात्र ही संत कहे जाते हैं।
       संत-काव्य की ऐतिहासिक स्थिति विक्रम की पंद्रहवीं शती में मानी जाती है, जबकि इसकी रचना का
आरंभ ईसवी सन् की बारवीं शती से ही माना जाना चाहिये। भक्त कवि जयदेव ही वस्तुत: संत काव्य-परंपरा
के भी प्रथम पथ-प्रदर्शक ठहरते हैं। हिंदी में संत-काव्य परंपरा से वैसे प्राय: कबीर आदि संतों की रचनाओं
का ही अभिप्राय लिया जाता है।
  वस्तुत: संत-काव्य परंपरा की भव्य इमारत 'कागद लेखी' पर नहीं 'आँखिन देखी' पर आधारित है।
अनुभव, ज्ञान और प्रत्यक्ष दर्शन ही इसके विविध उपकरण हैं। इसीलिये प्राचीन परंपराओं और पुराणों का इसमें
सर्वथा बहिष्कार किया गया है। कई बार इसे बौद्ध धर्म के परवर्ती रूपों से भी अनुप्राणित माना जाता है। बौद्ध
धर्म से वैपुल्यवाद या महायान, महायान से मंत्रयान, मंत्रयान से वज्रयान या तांत्रिक बौद्ध और इसी तांत्रिक बौद्ध
से विकसित नाथ मत के प्रेरणामूलक तत्वों को ग्रहण कर यह संतमत पनपा । बौद्धों का शून्यवाद, नाथों की योग
और अवधूत-भावना, व्रजयानियों की संध्या की उलटबाँसियों का समाहार संत-मत में कर लिया गया । इसीलिये
अवतार, मूर्ति, तीर्थ, व्रत-माला आदि यहाँ प्राय: अग्राह्य हैं। इन लोगों का मन शून्य, सहज समाधि और
कायातीर्थ में रमा है।
     वैष्णव धर्म का दक्षिणी प्रवाह छठी शताब्दी में आलवारों से होकर उत्तर की ओर बढ़ चला। इसमें
कुमारिल स्वामी के मतों के कारण बाधा भी आई। यह संत ज्ञानेश्वर से भी प्रभावित हुआ । इसी समय नामदेव
के विट्ठल की उपासना के कारण इसपर आत्मचिंतन का भी प्रभाव पड़ा जिससे रहस्यवाद की अनुभूति जगी।
इसमें वर्ग-भेद नहीं था। फलतः इसमें कर्मकांड के बदले हृदय की पवित्रता, आचरण की शुद्धता और
'नामस्मरण' को महत्त्व मिला । मुसलमानी प्रभाव के कारण मूर्तिपूजा का अभाव भी आया । अस्तु जिस संतकाव्य
का प्रणयन उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति को लेकर हुआ उसका पूर्वार्द्ध विट्ठल संप्रदाय द्वारा पूर्व में ही प्रस्तुत
हो चुका था। उत्तर में रामानंदी भक्ति के नवीन प्रयोग तथा मुस्लिम धर्म की हिंसा एवं प्रेममयी प्रवृत्तियाँ भी
इसकी भूमिकाएँ प्रस्तुत कर चुकी थीं । नवोदित सूफी मत भी मूलत: शंकर के अद्वैत के अधिक निकट था।
उसमें प्रेम का खुमार अधिक था। इससे भी संत-मत प्रभावित हुआ। अस्तु डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह
कथन “यदि कबीर आदि निर्गुण-मतवादी संतों की बाहरी रूपरेखा पर विचार किया जाय तो मालूम होगा कि
यह संपूर्ण भारतीय है और बौद्ध-धर्म के अंतिम सिद्धों और नाथपंथी योगियों के पदादि से इसका सीधा संबंध
है" तर्कसंगत है। निश्चय ही सिद्धमत में ही हमें संत-मत' का प्रारंभिक रूप मिलता है। नाथपंथ दोनों को
मिलानेवाली मध्यम कड़ी है।
   इतिहास गवाह है कि ये सिद्धपंथी घट-घट के भीतर योग-क्रिया के द्वारा 'अनहद नाद' सुनते थे और
जिसकी आवाज डमरू की तरह होती थी―
              "नाड़ी शक्ति दिअ धरिअ खदे । अतह डमरू बाजइ वीरनादे ।
               कान्ह कपाली जोगी पइठ अचारे । देह नअरी बिहरई एकारे।"

इसी का वैज्ञानिक और विकसित रूप हमें नाथपंथ के हठयोग में मिलता है, जिसमें साधक जब कुंडलिनी
शक्ति को उदबुद्ध कर सदाचार में ले जाता है तो अमृत-रस की वर्षा होती है। कबीर ने भी इसे संतमत में स्थान
दिया है। जाहिर है कबीर के काफी पूर्व ही संत मत की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। स्वयं कबीर का जन्म
योगियों के उसी कुल में हुआ था जिस पर सिद्ध और नाथ-पंथ का प्रभाव था। अत: हठयोग की साधना तथा
वेद-पाठ, तीर्थ-स्नान, छूआछूत आदि बाह्य अनुष्ठानों के प्रति अविश्वास की भावना योगियों से ही उन्हें विरासत
में मिली थी।

                                                          ★★★
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