पुरातात्विक स्रोत
पुरातात्विक स्रोत

पुरातात्विक स्रोत का प्राचीनतम साक्ष्य झारखंड क्षेत्र से आज से लगभग 1,00,000 ई. पूर्व के पुरापाषाणकालीन (Paleolithic) पत्थर के उपकरण के रूप में प्राप्त हुए हैं। पुरापाषाणकालीन पाषाण उपकरण हस्तकुठार बोकारो से तथा हजारीबाग के इस्को, सरैया, रहम, देहोंगी आदि से प्राप्त हुए हैं।
पाषाणकालीन उपकरणों से झारखंड में आदिमानव के रहने का प्रमाण मिलता है। 1991 ई. में हजारीबाग के इस्को में किए गए उत्खनन से एक पाषाण पर चित्रकारी का नमूना मिला है, जिससे दो प्राकृतिक गुफाओं की जानकारी मिलती है । साथ ही इस्को से ही भूल भूलैया वाली आकृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। हजारीबाग जिले के ही सतपहाड़ सरैया, रहम, देहांगी तथा रामगढ़ जिले के गोला, कुसुमगढ़, बड़कागांव, बांसनगर, मांडू, देसगार, करसो, परसाडीह, बरागुंडा, रजरप्पा आदि स्थलों से कुल्हाड़ी, खुरचनी, बेंधक, तक्षणी आदि उपकरण प्राप्त हुए हैं। पलामू जिले के शाहपुर, रंका कला, बजना, झाबर, नाकगढ़ पहाड़ी, बालूगारा आदि से पाषाणकालीन कुल्हाड़ी, स्क्रेपर, ब्लेड आदि प्राप्त हुए हैं। गढ़वा जिला अन्तर्गत भवनाथपुर के निकट प्रागैतिहासिककालीन शैलचित्र एवं अनेक प्राकृतिक गुफाओं के प्रमाण मिले हैं। इन गुफाओं में आलेख एवं पशुओं के चित्र हैं। इन पशुओं में भैंसा, हिरण आदि को चित्रित किया गया है ।
पश्चिमी एवं पूर्वी सिंहभूम के चक्रधरपुर, बेबो, इसाडीह, बारूडीह, पूर्णापानी, डुंगडुंगी, सरेंगा आदि स्थलों से पुरातात्विक उत्खनन से पुरापाषाण काल से नवपाषाण काल तक के क्रोड, शल्क, खंडक, विदारणी, तक्षणी आदि पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। बारूडीह में संजय और सोन - नाला नदी के संगम से नवपाषाणकालीन मृदभांड, मिट्टी के बर्तन के टुकड़े, पत्थर की हथौड़ी तथा डुगनी, डोर, नीमडीह और बोनगरा से नवपाषाणकालीन पत्थर की कुल्हाड़ी तथा काले रंग के मृद्भांड प्राप्त हुए हैं। हजारीबाग के दूधपानी से 1894 ई. में किए गए उत्खनन से 8वीं सदी के लेख प्राप्त हुए हैं।
दूधपानी के निकट ही स्थित डुमडुमा से 8वीं एवं 12वीं सदी की पालकालीन मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के विस्तार को स्पष्ट करता है । चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड में मुगलकालीन कुंपा का किला स्थित है तथा चतरा जिला में ही हंटरगंज प्रखंड में कोलुआ पहाड़ी क्षेत्र से मध्यकालीन दुर्ग की चहारदीवारी का साक्ष्य मिला है।
कोलुआ पहाड़, जो कौलेश्वरी पहाड़ के नाम से भी प्रसिद्ध है, पर हिंदू देवी- देवताओं एवं जैन तीर्थंकरों तथा बुद्ध की मूर्तियाँ स्थापित हैं । कौलेश्वरी पहाड़ सिख धर्म का भी केंद्र रहा है तथा ऐसा माना जाता है कि गुरुनानक इस स्थान पर ठहरे थे । पुरातात्विक स्रोत में पत्थर की स्लेट के टुकड़े बुरहादी से और रारू नदी के तट से जो चाईबासा में स्थित है, से नवपाषाणकालीन पत्थर से निर्मित अनेक चाकू मिले हैं।
एस.सी. राय को बुरूहातु से स्लेटी पत्थर की छेनी, क्वार्टज पत्थर की पालिशदार छेनी तथा लोहे और तांबे की आरी प्राप्त हुई है । चतरा जिला के गिद्धौर प्रखंड से मेगालिथ संस्कृति के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
पलामू के मूर्तियाँ नामक स्थल से बौद्ध धर्म के अनेक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जबकि करूआ (धनबाद) नामक ग्राम बौद्ध स्तूप का प्रमाण पाया जाता है। धनबाद जिले के ही बुद्धपुर एवं डाल्मी में भी अनेक बौद्ध स्मारक स्थित हैं । बुद्धपुर की पहाड़ियों में बुद्धेश्वर मंदिर के भग्नावशेष स्थित हैं । अशोक के 13वें शिलालेख में आटविक जातियों का उल्लेख हुआ है, जो इसी क्षेत्र में निवास करने वाली जनजातियाँ थीं।
दूधपानी के निकट ही स्थित डुमडुमा से 8वीं एवं 12वीं सदी की पालकालीन मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के विस्तार को स्पष्ट करता है । चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड में मुगलकालीन कुंपा का किला स्थित है, तथा चतरा जिले में ही हंटरगंज प्रखंड में कोलुआ पहाड़ी क्षेत्र से मध्यकालीन दुर्ग की चहारदीवारी का साक्ष्य मिला है।
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