साहित्यिक स्रोत
साहित्यिक स्रोत

भारत के इतिहास के प्रारंभिक साहित्यिक स्रोत, वैदिक साहित्य में छोटानागपुर क्षेत्र के लिए 'किक्कट' शब्द का प्रयोग हुआ है, जबकि उत्तर वैदिक साहित्य में यह व्रात्य प्रदेश के रूप में वर्णित हुआ है। महाभारत के दिग्विजय पर्व में छोटानागपुर क्षेत्र के लिए पुडरिक शब्द का वर्णन आया है। महाभारत में झारखंड क्षेत्र को पशुभूमि कहा गया है क्योंकि जंगल की बहुलता के कारण इस क्षेत्र में जंगली पशुओं की संख्या अधिक थी। मध्यकालीन इतिहास लेखकों में अबुल फजल का 'अकबरनामा', शम्स-ए-शिराज अफीफ की रचना 'तारीखे- फिरोज-शाही' तथा सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की रचना 'पद्मावत' प्रमुख स्रोत हैं। शम्स-ए-सिराज अफीफ का मानना है, कि जंगल-झाड़ की अधिकता के कारण ही इस क्षेत्र का नाम झारखंड पड़ा है। इसके अतिरिक्त जहाँगीर की आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी', शाह नवाज खान तथा अब्दुल खान की रचना 'मासिर - उल - उमरा' तथा मिर्जा नाथन की रचना 'बहारिस्तान-ए-गैबो' में भी झारखंड के नामकरण से लेकर सामाजिक- सांस्कृतिक इतिहास की जानकारी मिलती है। मध्यकालीन एवं अन्य इतिहासकारों सलिमुल्ला और गुलाम हुसैन की रचनाओं में भी झारखंड क्षेत्र का विवरण मिलता है। कबीरदास की रचनाओंमे में झारखंड शब्द का उल्लेख एक पद में आया है।
बोरमैन की पुस्तक 'द निरयोलिथिक पैटर्न इन द प्री हिस्ट्री ऑफ इंडिया' से नवपाषाणकालीन हस्तकुठारों के 12 प्रकारों की जानकारी मिलती है। डी. एन. मजूमदार की पुस्तक 'रेसेज एंड कल्चर्स ऑफ इंडिया' से चेरो, खरवार, भूमिज, संथाल आदि जनजातियों के बारे में उनके झारखंड आगमन तथा सांस्कृतिक-सामाजिक जीवन की जानकारी मिलती है।
डाल्टन की पुस्तक 'द कॉल ऑफ छोटानागपुर', अमरनाथ दास का 'अमरकोष', एल. टिकेल की पुस्तक 'नाट्स ऑन ए टूर इन मानभूम ' तथा 'इथनोलॉजी ऑफ बंगाल' आदि पुस्तकों में जनजातीय इतिहास एवं संस्कृति का तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
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